Wednesday, May 26, 2010

जीवन में व्यक्तिगत स्वार्थ

आज ऑफिस में दोपहर के भोजन के बाद हुए वार्तालाप ने मुझे पुनः कुछ लिखने के लिए प्रेरित कर दिया है। हमारा विषय था कि क्या हम लोग अपने जीवन में व्यक्तिगत स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ भी सोचते है ? हम सब अपने जीवन में अपनी मौलिक जरूरतों से ज्यादा धन का अर्जन करते हैं, पर हम में से कितने ही लोग है जो अपनी बचत में से कुछ अंश भी अपने समाज के किसी उपयोगी कार्य के लिए प्रयोग करना चाहते है!

क्या सिर्फ अपने लिए जीना और अपने लिए ही सोचना सही है? क्या ऐसा करना कोई अपराध है? "अपराध" शब्द का उपयोग शायद बहस का विषय हो सकता है क्योंकि स्वार्थी होना और अपराधी होना एक सामान नहीं कहा जा सकता है।

कुछ महापुरुषों का उदहारण देखते है .....

गौतम बुद्ध हमेशा से बुद्ध नहीं थे, वो एक ऐसे राजकुमार थे जिसने जिंदगी में कभी दुःख नहीं देखा था, कभी बुढ़ापा नहीं देखा था, और जब उन्होंने इसे पहली बार महसूस किया, उनकी अंतर्चेतना जाग उठी। राजा अशोक ने कलिंग के युद्ध में भीषण नरसंहार किया परन्तु विजय भी उनके अंतर्मन को जागने से रोक नहीं सकी। पर अशोक बुद्ध नहीं बने, बल्कि बुद्ध के अनुयायी बन गए | अशोक ने कर्म में धर्म को अपनाया। क्या शांति के मार्ग को अपना कर अशोक पूर्व जीवन के अपराधो से मुक्त हो गए ?

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अंहिंसा और सत्य का चरमोत्कर्ष कब पाया? गाँधी ने एक आम पुरुष से महापुरुष बनने में किस चीज़ से प्रेरणा पाई ? गाँधी ने वकील बनकर एक बेहतर जीवन जीने के लिए विदेश से वकालत करने का रास्ता चुना। अगर रेलगाड़ी में उनको प्रथम श्रेणी से धक्का ना मारा जाता तो शायद वकील कभी महात्मा नहीं बन पाता।

अब प्रश्न यह है कि अच्छे कार्यो की प्रसंशा करना और अच्छे कार्य करना क्या तुलनात्मक है? गाँधी का सम्मान करना और गाँधी को धारण करना ... ये दोनों ही सामानांतर विचार है और इनमे कोई तुलना नहीं है ।

बहुत कुछ लिखने का मन है ... कभी और ...

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