Monday, May 3, 2010

मातृभाषा में अभिव्यक्ति का संकट

अमेरिका में आने के बाद मुझे एक एहसास हमेशा आता रहा कि मेरी मात्र-भाषा मुझसे दूर होती जा रही है। हम अपनी रोज़ मर्रा की जिंदगी में अपनी भावनाएं किसी और ही भाषा में व्यक्त करने लगे हैं। यह एहसास तब और प्रबल होता है जब मै अपने बच्चे को Ouch बोलते हुए सुनता हू। शायद मैंने अपने बचपन में कभी चोट लगने पर Ouch नहीं बोला होगा।

हम लोगो ने अपने साहित्य को पढना भी करीब करीब बंद सा ही कर दिया है | पता नहीं कि कितने लोग अब हिंदी साहित्य में सक्रिय योगदान कर रहे है। जिस भाषा का अतीत इतना सु-संस्कृत और सम्रद्ध था, उसमे अगर नया योगदान न हो तो वो भाषा अपनी पहचान ही खो देगी।

ये संकट शायद भारतवर्ष में बोली जाने वाली सभी 52 स्थानीय भाषाओं पर है। यह संकट अस्तित्व का है ... और इसके दूरगामी प्रभाव हमारी संस्कृति और सभ्यता पर होंगे।

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